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नोटबंदी का एक महीना "गुड़ से गोबर तक"

नोटबंदी को एक महीने से ज़्यादा हो गया है आज भी बैंको में नोटबंदी के पहले दिन जैसी जस की तस लाइनें है बल्कि और ज़्यादा परेशानी बढ़ चुकी है, ज़्यादातर को यह नोटबंदी का फैसला सही लगा था मैं भी उनमें से एक था जब न्यूज़ में देखा की पांच सौ और हज़ार के नोट बंद तो लगा अब काला धन रखने वाले पकडे जाएंगे और देश साफ स्वच्छ हो जाएंगे ख़ैर रात में 2 बजे तक नोटबंदी पर जोक्स पढकर मस्त सोया, सुबह उठा तो मेरी जेब में दो हज़ार रुपए थे जो चार पांच सौ के नोट थे मैंने सोचा बैंक चलता हूँ और इन्हें बदलवा लेता हूँ मैं बैंक पहुँचा तो बैंक के अंदर छोड़ो बाहर इतनी भीड़ थी की सड़क तक जाम हुए जा रही थी । मैं बिना जमा किये या बदले बैंक से आ गया सोचा बाद में बदल लूंगा थोड़े दिन की बात है फिर यह भीड़ छट जायेगी । कुछ दिन बाद जैसे तैसे करके वो रुपए मैंने अपने खाते में जमा करायें क्योंकि भीड़ ज़रा सी भी कम नहीं हो रही थी ।
              आज भी यही हाल है मैं बैंक में कभी महीने या दो महीने में चला जाता था ज़्यादा काम एटीएम से होता था लेकिन अब हर तीसरे दिन बैंक जाना पड़ता है क्योंकि एक बार में बैंक वाले सिर्फ दो हज़ार या चार हज़ार रुपए ही देते है और इसमें बैंक वालों की कोई ग़लती नहीं है वो तो औसतन समय से लगभग चार या पांच घण्टे अधिक काम कर रहे है जब बैंको में कैश ही नहीं पहुँचता तो कहाँ से वे चौबीस हज़ार एक को दे देंगे। बैंककर्मीयों के बीवी बच्चे घर परिवार सब है और उनकी भी लिमिट आम आदमी जितनी ही है, बैंक कर्मी इतना काम करने के बाद तनाव में आ जाते है क्योंकि काम के साथ साथ वो लोगों की बदज़ुबानी, गाली, इलज़ाम भी बर्दाश्त करते है ।
              आम आदमी जो प्रतिदिन तीन सौ रुपए की मजदूरी करता है अब उसे कई कई दिन मज़दूरी नहीं मिलती, काम नहीं मिलता अब वो कई दिन तक अपने पैसों को ही निकालने के लिए अपने पैसे गवांता है, बाहर काम करने वाले मज़दूर अब अकाउंट से पैसे नहीं भेज सकते उनके बच्चे यहाँ भूखे मरते है, लाइन में लगे लगे कई लोग मर चुके है पैसे निकालने जाते हुए भी लोगों की मौत हुई है पहले ही दिन बैंककर्मी जब काम निपटा के जा रहे थे तब भी एक हादसे में पूरे स्टाफ की मौत हो गई थी अब भी आम आदमी यह सब झेल रहा है चलो इतना सब कुछ हम अपने देश के निर्माण में कुर्बान करते है यही आगे क़ुर्बान करने के लिए भी तैयार है लेकिन देश निर्माण की गारंटी लेने को कोई तैयार है कौन यह ज़िम्मेदारी लेगा की इतना सब कुछ नोटबंदी के कारण होने के बाद देश कालेधन से मुक्त हो जायेगा अरे कैसे लोगे गारंटी कैसे उठाओगे यह भारी भरकम लोगो के खून से वजनी हुई ज़िम्मेदारी जब नए नोटों के 17 लाख, 20 लाख, और कई कई करोड़ नए नोट अभी से पकडे जाने लगे, अब लाइन में यह सोच कर खड़े हो जाए देश के निर्माण में सैनिकों की तरह खड़े हो जाए लेकिन उनका खड़ा होना सार्थक होता है हमारा नहीं हो रहा हमारा खड़ा होना बर्बाद हो रहा है और आज भी वो लोग जो कह रहे है कि सिर्फ कालेधन वाले परेशान है वो बैंको में एक दो घण्टे एटीएम के बाहर एक दो घन्टे बिताये देखे की सिर्फ यह दूसरे लोग ही रो रहे है या आम जनता भी रो रही है वो भी रो रहे है जो साठ साल बासठ साल के बुज़ुर्ग जो पेंशन पर ज़िंदा है वो रो रहे है देखो महसूस करो सिर्फ अंध भक्ति में फ़ेसबुक और व्हाट्सअप पर चापलूसी, चमचागिरी, डायलॉग बाज़ी न करो । अब मुझे गुड़ गोबर होने वाली कहावत याद आ रही है । नीचे अपना नाम गालियों और बिना जनता के दर्द के महसूस किये अंधभक्ति भरे जुमलों की अपेक्षा करते हुए लिख रहा हूँ ।
             
         -     आसिफ कैफ़ी सलमानी
Written By - Asif Kaifi Salmani

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