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पछतावे से पहले पछतावा - लघु कथा


अजय का विवाह हुए अभी नौ ही महीने हुए थे लेकिन अभी तक पति पत्नी में सामंज्य बैठ नहीं पाया था दोनों में कोई समझने को तैयार नहीं था लेकिन अजय फिर भी समझदार था और अपनी पत्नी को बहुत प्रेम करने लगा था और बड़ी छोटी बातों का ख्याल भी खूब रखता था लेकिन उसकी पत्नी आशा किसी नासमझ, ज़िद्दी और बिगड़ैल बच्चे की तरह आए दिन कुछ न कुछ बखेड़ा खड़ा किए ही रहती थी जिससे अजय बहुत परेशान रहने लगा था
              लेकिन समाज और घर परिवार की लज्जा के लिए चुप रहता जब उसकी पत्नी परेशान करती तो अक्सर दुखे दिल पर कह दिया करता था कि "मेरी कीमत मेरे जाने के बाद जानोगी अभी तो मैं तुम्हें मयस्सर हूं" ऐसी बात कोई ऐसे ही नहीं कहेगा जब दिल पर बहुत कुछ गुज़री होगी, जब बहुत कुछ दिमाग ने सहा होगा तब ऐसी बात कही होगी वरना तो कोई अपनी सबसे प्यारी चीज़ "जान" कोई ऐसे ही छोड़ने की बात नहीं करेगा।
              वैसे तो मियां-बीवी का रिश्ता बहुत ही खूबसूरत होता है चाहे वो धार्मिक ग्रंथो के अनुसार हो या सामाजिक व्यवस्था के अनुसार लेकिन बहुत बार ये सबसे खूबसूरत रिश्ता भी कुछ वजहों से ख़राब कर दिया जाता है और वजह भी अक्सर कोई बड़ी बड़ी नहीं होती बस छोटी छोटी बातें ही सब काम ख़राब कर देती है अगर थोड़ी देर ख़ुद की ज़बान पर काबू कर लिया जाए, कुछ देर अपने मन पर काबू कर लिया जाए और बातों को शांति के साथ समझ लिया जाए तो कोई झगड़ा हो ही ना।
              यूं ही कुछ दिन और गुजर गए अब लगभग दस महीने हो चुके थे जहां टकराव था वहां प्यार भी था बस अजय की तरफ से ज़्यादा और आशा की तरफ से कम कुछ दिन बाद आशा मायके गई हुई थी उसी दौरान अजय ने आने को लेकर कहा जिस पर आशा ने आने से मना कर दिया तो थोड़ा बहुत झगड़ा हो गया जिससे बातचीत बंद चल रही थी उसी दौरान तेज़ आंधी के साथ बारिश हुई जिससे कई जगह के बिजली के खंबे गिर गए थे और शहर में बिजली दो दिन बाद आई अजय के फोन की बैटरी डाउन हो गई थी।
              जब बिजली आई तो अजय के घर नहीं आई क्योंकि उनके घर का तार बिजली के खंबे से हट गया था अजय ये सोचते हुए कि फोन डाउन है और आशा फोन कर रही होगी वो बिना विद्युत विभाग के कर्मचारियों की प्रतीक्षा के खंबे पर जा चढ़ा लेकिन खंबे में करंट आया हुआ था जिस वजह से अजय की करंट लगने से मौत हो गई, एक झटके में सब खत्म न अजय न उसका बेबाकपन, न उसकी हंसी मज़ाक बस अब रह गया था तो अंधेरा ऐसा अंधेरा जो वो छोड़ गया था अपने घर वालों के लिए, आशा के लिए अब क्या होगा आशा का अब कहां जायेगी, क्या करेगी, आशा को अब समझ आ रहा था वो क्या था, क्या क्या करता था उसके लिए वो ज़रा सी बातें भी न सुन सकी थी उसकी और न ज़रा ज़रा सी बातें मान पाई थी और अजय की कही सब बातें सच हो गई थी उसके कानों में बस वही बातें गूंजती जा रही थी और वो बस रोते जा रही थी, रोते जा रही थी और अपने में बारे में सोच रही थी तभी आशा की भाभी आशा को जगाते हुए कहती है उठ जा आशा सात बजने वाले है, आशा हड़बड़ाकर उठती है नींद से उठते ही समझने में कुछ देर लगी लेकिन इतनी भी नहीं लगी वो जाग चुकी थी की यह सिर्फ ख़्वाब था एक डरावना ख़्वाब लेकिन बहुत बातें तो सही थी उसकी हरकतें, उसकी मूर्खता लेकिन अब आशा ने ठान लिया था की वो अब कभी अजय से झगड़ा नहीं करेगी और दौड़कर फोन उठाया तुरंत अजय का नंबर मिला लिया माफ़ी मांगी और दोनों बातो के लम्बे सफर पर निकल गए।
              यह सच है की पल भर का भी नहीं पता कब क्या हो जाए इसलिए बिना लड़ाई - झगड़े के, बिना ईर्ष्या के, बिना घमंड दिखाए, प्यार मोहब्बत से जिया जाए जिंदगी का हक़ अदा किया जाए।

✒️ आसिफ कैफ़ी सलमानी

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