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मोहब्बत का क़त्ल

दूर दूर तक चौहदवीं चांद की छिटकती हुई चांदनी, रात का दूसरा पहर दूर दूर तक सब सूनसान मानो चांदनी ने अपने आगोश में सबको थपक थपक कर सुला दिया हो, एक खंडहर जो कभी वहां की रानी का महल हुआ करता था उसकी सीढियां अभी भी सही थी वहीं सीढ़ियों पर एक ख़ूबसूरत सी लड़की बैठी हुई थी सफ़ेद रंग के कपड़े पहने हुए जिन पर ज़री गोटे का काम हुआ था बिल्कुल परी जैसी थी कोई उसके पीछे से एक परछाई उसके क़रीब आ रही थी वो डरकर पीछे मुड़ी, चीखीं, भागी, गिरी, खड़ी हुई ज़ोर से बोली ऐ नफ़रत तू मुझे कैसे ढूंढ लेती है मेरा पीछा क्यों नहीं छोड़ देती, सामने खड़ी हुई वो काली सी, बाल उलझे हुए, ख़ून में सने कपड़े, आती बदबू, स्याह शक्ल वाली बोली मोहब्बत क्या तू अभी तक नहीं समझ पाई मैं कैसे तुझे ढूंढती हूँ तभी कुछ घुड़सवार तेज़ी से आते है सभी गंदे से कपड़े, उठती बदबू और खून अलूदा कपड़ें पहने हुए है नफ़रत बोलती है मिलों इनसे यह है लालच, यह सत्ता का लालच, यह बहकावा, यह गुस्सा, यह चुगली, यह झूठ अब तो मोहब्बत तुम समझ चुकी न मेरे साथी कौन है इन्ही के सहारे मैं तुम तक पहुंच जाती हूँ और वहां से तुम्हें खदेड़ देती हूं लेकिन यह भी अकेले ही सारा काम नहीं करते बल्कि यह तो ज़बरदस्ती भी नहीं करते बस यह सब उनके पास पहुंच जाते है जिन्हें इनकी ज़रूरत होती है जो इनसे प्यार करते हो और फिर ताक़तवर होती हूं मैं और मेरा ताक़तवर होना तुम्हारा ख़ात्मा अब तुम यहाँ से भी ख़त्म हो जाओगी, मोहब्बत चीख़ती है और नफ़रत अपने साथियों से मिलकर मोहब्बत का क़त्ल कर देती है।
      अब सुबह होते ही उस शहर के दामन पर ख़ून ही ख़ून लगा होता है लाशें, मजबूर लोग, घायल लोग, कोई पूछता है यह सब कैसे हुआ कोई कुछ नहीं बोलता फिर एक बुज़ुर्ग खड़े होकर बोलता है कुछ लालची लोगों को सत्ता चाहिए थी तो दो धर्मों के लोगों को जो यहां मोहब्बत के साथ रहते थे उन्हें ज़रा सी बात पर लड़ा दिया और इस काम में लोगों के ग़ुस्से, झूठ और बहकावें ने आग में घी का काम किया और मोहब्बत ख़त्म हो गई लोग मेरा धर्म, मेरे धर्म के लोग चिल्लाते रहें और मोहब्बत ख़त्म हो गई लोग समझ ही नही पाए सत्ता के लालच, बहकावे को और अपने साथ साथ इंसानियत का भी नुकसान कर दिया उसकी भी लगभग मौत सी हो गई।

              ✒ आसिफ कैफ़ी सलमानी
             Written By - Asif Kaifi Salmani

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