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वो फिर मिली

मैंने उस वक़्त इंटरमीडिएट पास की थी कोई ख़ास नंबर से तो नहीं लेकिन हां गांव में इकलौता था इतने नंबर लाने वाला, मैंने अब आगे पढ़ने की सोची तो कॉलेज में एडमिशन के लिए शहर जाना हुआ
और तीसरी मेरिट में नंबर भी आ गया था एडमिशन हो गया था मेरे दोस्तों में से सिर्फ एक दोस्त था जो मेरे साथ गांव से अब शहर में भी मेरे साथ था मैं ज़्यादा स्टाइलिश नहीं था लेकिन कॉलेज जाना था तो मेरे दोस्त ने मुझे अच्छे कपड़े खरीदने की एडवाइज दी और मैंने अच्छे कपड़े खरीदे और कॉलेज जाने लगा तीन दिन तक कॉलेज में कुछ ख़ास नहीं हुआ था लेकिन चौथे दिन एक अजब सी चीज़ हुई थी ।
                 क्लास में एक लड़की आई वो भी हमारी क्लासमेट ही थी किसी वजह से कॉलेज शुरू होने के तीन दिन बाद आई थी थोड़ी लेट भी थी लेकिन जैसे ही आई पता नहीं क्यों मैं उससे नज़रे नहीं हटा पा रहा था उसने काली बिंदी वाला सफेद रंग का सूट सलवार उस पर हाथ से बुनी जर्सी पहनी थी और हाथ में किताबें लिए थी
वो सीधे मेरे पास चली आ रही थी उसे सामने से आता देख बहुत सर्दी होने की बावजूद मेरे कान गर्म हो चुके थे मेरी सीट के पास आने के बाद बोली "क्या यहां मैं बैठ सकती हूँ" मैंने हां में गर्दन हिला दी मेरे दोस्त के न आने की वजह से आज मैं अकेला बैठा था लेकिन अब एक लड़की मेरे पास बैठे थी वो भी उसके जो बचपन से बॉयज स्कूल में पढ़ा हो उसने लेक्चर के दौरान मुझसे कोई बात नहीं की लेक्चर खत्म होने पर उसने हाथ बढ़ाते हुए अपना नाम बताया 'नेहा' और मैं बेवकूफ़ हाथ जोड़कर रह गया था 'राघव' और फिर वो सी यू बोलकर तेज़ी से क्लास से निकल गयी थी ।
मुझे पहली नज़र में अच्छी तो लग ही गई थी तो अब मैं रोज़ उससे बात करने लगा था वो भी बात कर लिया करती थी ।
धीरे धीरे हम अच्छे दोस्त बन गए थे लेकिन मुझे अच्छे दोस्त से आगे जाना था उससे प्यार जो कर बैठा था तो अब मैं कभी कभी उसके घर आने जाने लगा था मुझे एक दिन पता चला की उसे शिउली के फूल बहुत पसंद है तो मैं बहुत से शिउली के फूल कागज़ की बनी छोटी टोकरी में भरता और सुबह सुबह उसके घर के दरवाज़े पर रख देता वो क्लास में भी मुझसे बताती की कोई रोज़ शिउली के फूल हमारे दरवाज़े पर रख देता है लेकिन फिर बताना छोड़ दिया था शायद उसने मुझे रखते हुए देखा हो, यूं ही तीन साल कब निकल गए पता ही नहीं चला था मैंने सोचा था की फाइनल एग्जाम के बाद अपने दिल की बात उसे बता दूंगा ।
             एग्जाम हुए और जिस दिन डिग्री मिलने वाली थी उस दिन वो मुझे एक तरफ ले गई और बैग में से शादी का कार्ड निकाल कर मेरे हाथ पर रख दिया और आंसू भरी आंखों को लेकर तेज़ी से वहां से चली गई, कार्ड उसकी ही शादी का था मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे बहुत ज़ोर से तमाचा मारा हो और मेरे कान बहरे हो गये हो बहुत देर तक उसे लेकर बैठा गया ।
             असल में मेरे ग़लती थी मुझे लगता था अगर बोलूंगा तो कहीं हमारी दोस्ती भी ख़त्म न ही जाए बस इसी वजह से बोल नहीं पाया था लेकिन आज पता चला की वो भी मुझसे प्यार तो करती थी तभी तो उसकी आंखों में आंसू थे
उसके बाद मैंने उससे मिलने कोशिश की फ़ोन भी की लेकिन वो शादी करने अपने पैतृक गांव जा चुके थे उस रात मेरी आधी रात में आंख खुली मैं बहुत रोया था पता नहीं क्यों बहुत सालों बाद दशकों बाद .. बस रोता रहा पता नहीं कितनी देर ।
                    उसे अचानक से अभी देखा उसे देखते ही यह सभी बातें एक सेकेंड में मेरी नज़रों से गुज़र गए और अब मैं दिल्ली में हूँ सामने मेट्रो में वही है 5 साल बाद मुझे मिली है सामने बैठी है और साथ में एक आदमी है शायद उसका पति ही हो, मैं नज़रे छुपा छुपा कर उसे देख रहा हूँ वो अब किसी स्टेशन पर उतर जाएगी और मैं दिल की बात उसे न बोलने की ग़लती के नीचे फिर कई ग़ज़ धंस जाऊंगा ।
   ✒ आसिफ कैफ़ी सलमानी
             Written By - Asif Kaifi Salmani

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3 Comments

  1. दिल को छू लिया साहब

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