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हम तिरे बाद दर ब दर भी नहीं - ग़ज़ल/कामरान आदिल

हम तिरे बाद दर ब दर भी नहीं
और यूँ है कि अपने घर भी नहीं

ہم ترے بعد در بدر بھی نہیں
اور یوں ہے کہ اپنے گھر بھی نہیں

हमने माना नहीं तवील मगर
अपनी रूदाद मुख़्तसर भी नहीं

ہم نے مانا نہیں طویل مگر
اپنی روداد مختصر بھی نہیں

जिनकी ठोकर में मन्ज़िलें थी कभी
उनकी क़िस्मत में अब सफ़र भी नहीं

جن کی ٹھوکر میں منزلیں تھی کبھی
ان کی قسمت میں اب سفر بھی نہیں

तुम जो इतना डरा रहे हो मुझे
इश्क़ इस दर्जा पुर ख़तर भी नहीं

تم جو اتنا ڈرا رہے ہو مجھے
عشق اس درجہ پر خطر بھی نہیں

सच तो ये है कि मर चुके हम लोग
और इस की हमें ख़बर भी नहीं

سچ تو یہ ہے کہ مر چکے ہم لوگ
اور اس کی ہمیں خبر بھی نہیں

कुछ सबब है हमारी पस्ती का
वरना हम लोग बे हुनर भी नहीं

کچھ سبب ہے ہماری پستی کا
ورنہ ہم لوگ بے ہنر بھی نہیں

जिस क़दर हम गुमान करते हैं
ज़िन्दगी इतनी मौतबर भी नहीं

جس قدر ہم  گمان کرتے ہیں
زندگی اتنی معتبر بھی نہیں

🖋️ कामरान आदिल - کامران عاؔدل 🖋️

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