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ख़्वाबों का / ग़ज़ल


आरज़ू क़ज़ा की है फ़लसफ़ा है ख़्वाबों का
एक उम्र से मेरे रतजगा है ख़्वाबों का

मंज़िलें ख़्यालों की रास्ता है ख़्वाबों का
साथ बरसों से मेरे सिलसिला है ख़्वाबों का

अब सवाल करते हैं लोग सब यही मुझसे
क्या हुआ बताओ कुछ क्या हुआ है ख़्वाबों का

आईना हकीक़त का मत मुझे दिखाओ तुम
मैं जिया हूँ ख़्वाबों में दिल रहा है ख़्वाबों का

वादे नित नये करके वो नये दिखाये ख़्वाब
क्या बतायें हम तुमकों रहनुमा है ख़्वाबों का

मोड़ पर किसी भी मैं रुक मगर नहीं सकता
साथ मेरे लोगों इक काफिला है ख़्वाबों का

वास्ते खुदा के अब लौट आओ जानां तुम
आसूं ये बुलाते हैं वास्ता है ख़्वाबों का

क्या सुलूक अपनों का तुमकों अब सुनायें हम
पंख हौसलों के टूटे दिल जला है ख़्वाबों का

हुस्न की मलिक उसके क्या कशिश को समझायें
आखें हैं सुराहीं सी मयक़दा है ख़्वाबों का

     ✒️ नवाब मलिक



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