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यक तरफ़ा



जनवरी का महीना, सर्द मौसम के बावुजूद उसके माथे पर पसीने की बूंदे चमक रही थीं,और आँखों में आँसू ऐसे उमड़ रहे थे, मानो कोई सैलाब आने वाला है, बाल बिखरे हुए, शर्ट के ऊपर के तीन बटन खुले हुए, हाथ में अपना शेरी मजमुआ लिये, वो जैसे ही बोझिल क़दमों से कमरें में दाख़िल हुआ, दर्द भरी आवाज़ में झुंझला कर बोला-

रविश, महज़ बकवास थीं तुम्हारी वो सब बातें। क्या कहते थे तुम?शायरी जादू है,

सीधा दिलों पर दस्तक देती है,

लड़कियां जान छिड़कती हैं शायरों पर,

असीर बना लेता है शाइर लोगों को अपना हूँमम्म .,,,

अब उसके आँसूं बहने लगे थे,और वो दर्द जो उसने अर्सा ए दराज़ से सीने में दबा रखा था, उसकी आँखों से बून्द बून्द  टपकता हुआ साफ़ ज़ाहिर हो रहा था,

वो एक सांस बोले जा रहा था, रात काफ़ी हो  गई थी और होस्टल की तमाम लाईट्स बन्द हो चूंकि थी, मैं किसी सूरत नहीं चाहता था उसके रोने की आवाज़ कमरे से बाहर जाए
आख़िर बात थी भी तो इश्क़ की,और इश्क़ भी वो जो जान ले ले,आतिफ़ को जब से ये मालूम हुआ था, कि ज़ोया को शायरी से ख़ास लगाव है, वो 'नासिर' 'फ़राज़' और 'जौन' की दीवानी है, ज़ोया उन को घण्टों पढ़ती थी और उसको बहुत से अशआर ज़बानी याद थे जो दौरान ए गुफ़्तुगू वो कहीं पर भी बेसाख़्ता बोल देती थी, सच तो ये है कि आतिफ़ ज़ोया की इस अदा और हाज़िर जवाबी का क़ायल हो चुका था बज़ाहिर तो ज़ोया एक आम सी लड़की थी लेकिन उसमें बहुत कुछ ख़ास था, मोरनी जैसी चंचलता और, फ़्री माइण्ड लबों पर चमकीली मुस्कान लिये खुल कर हर इक से मिलना-जुलना

बेहद ज़हीन, और अच्छे नम्बरों से पास आने वाली, आला अख़लाक़ की हामिल लड़की थी, हाल ही में उसने एम.ए में यूनिवर्सिटी टॉप किया था, वो मुझसे जब भी ज़ोया के बारे में बात करता था तो मैं शायरों की शान में चन्द तारीफ़ी जुमले कहते हुए, उससे जान छुड़ाने को कह देता था, मेरे दोस्त अगर ज़ोया को हासिल करना है तो शाइर बन जाइये, आतिफ़ बहुत हस्सास तबियत लड़का था, पता नहीं,

उसने मेरी इन बातों को कब सीरियसली ले लिया और वो ज़ोया की तलब में, देखते ही देखते बहुत कम अर्से में आतिफ़ से आतिफ़ "अमान"हो गया उसकी एक किताब भी मन्ज़र ए आम पर आ चुकी थी और उसका ये अमल चोकने वाला था, अमान जनाब का तख़ल्लुस हो गया था। एक तो ये, यक तरफ़ा मोहब्बत, दूसरे जौन ऐलिया बनने का भूत, अब मैं क्या कहूं मेरी नज़र में तो ये दोनों ही मरज़ ला दवा हैं

इससे पहले में उसको कुछ समझता

उसने ये कहते हुए, इक लंबी सांस ली रविश, मेरे दोस्त उसने आज फिर कॉलेज के इजलास में, मेरे इज़हार ए ख़्यालात, इज़हार ए मोहब्बत और दर्द भरे कलाम को नज़र अंदाज़ कर दिया।

और उसने झट से अपनी किताब जलते हुए आतिश दान में फेंक दी, और वो मुझसे अलविदा कहते हुए धड़ाम से ज़मीन पर गिर पड़ा .......

मुझे आज भी, उसका ये शेर याद है -

मैं यक तरफ़ा मोहब्ब्त कर रहा हूँ
ख़ुदा हाफ़िज़ मिरी दीवानगी का

✒️ कामरान  "आदिल"
     Kamran "Adil"


नासिर - नासिर क़ाज़मी
फ़राज़ - फ़राज़ अहमद फ़राज़
जौन - जौन एलिया
(तीनों उर्दू साहित्य के नामचीन शायर)

यक़ - एक
ज़हीन - दक्ष, कुशल, प्रतिभावान
आला अख़लाक़ - अच्छा स्वभाव
हामिल - धारण करने वाली
हस्सास तबियत - स्वाभिमानी, खुददार,
तख़ल्लुस - उपनाम



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