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ज़मीं की सम्त क़दम हैं ना आसमां की तरफ़ - ग़ज़ल/कामरान आदिल

                 ग़ज़ल   غزل 

ज़मीं की सम्त क़दम हैं ना आसमां की तरफ़
मैं गामज़न हूँ फ़क़्त शहरे-रफ़्तगां की तरफ़

زمیں کی سمت قدم ہیں نہ آسماں کی طرف
میں گامزن ہوں فقط شہرِ رفتگاں کی طرف

मिरे ख़ुदा जो मिरा घर जला के निकली है
वो आग दौड़ पड़ी अब तिरे मकां की तरफ़

مرے خدا جو مرا گھر جلا کے نکلی ہے
وہ آگ دوڑ پڑی ہے ترے مکاں کی طرف

अजीब शख़्स है जन्नत की आरज़ू है उसे
घुमाए बैठा है जो पीठ अपनी माँ की तरफ़

عجیب شخص ہے جنت کی آرزو ہے اسے
گھمائے بیٹھا ہے جو پیٹھ اپنی ماں کی طرف

अमां की भीख नहीं मांगते अली वाले
कमान खींच के बढ़ते हैं दुश्मानाँ की तरफ़

اماں کی بھیک نہیں مانگتے علی والے
کمان کھینچ کے بڑھتے ہیں دشمناں کی طرف

हमेशा बांध के रक्खा फ़ुसूने-दुनिया ने
नज़र गई ही नहीं उम्र ए रायगां की तरफ़

ہمیشہ باندھ کے رکھا فسونِ دنیا نے
نظر گئی ہی نہیں عمرِ رائگاں کی طرف

बिसाते-ज़ीस्त प रक्खे हुए पियादे हैं
हमें धकेल दे जो चाहे जिस ज़ियाँ की तरफ़

بساطِ زیست پہ رکھے ہوئے پیادے ہیں
ہمیں دھکیل دے جو چاہے جس زیاں کی طرف

ये आईना जो चुराता है अब नज़र मुझसे 
था दिल बदस्त कभी मेरी दास्तां की तरफ़

یہ آئینہ جو چراتا ہے اب نظر مجھ سے 
تھا دل بدست کبھی میری داستاں کی طرف

कामरान "आदिल"        کامران عاؔدل
  
 

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