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बेबस मज़दूर

कहाँ हो तुम, हाँ तुम हुक्मरानों
क्या तुम्हें पता नहीं है कि ये मेहनतकशो ने कैसे कैसे इंक़लाब ला रखें है
क्या तुम ड़र नहीं रहे हो इनकी बद्दुआ से, इनके सीधेपन से और इनके दुःख दर्द से अगर नहीं ड़र रहे तो बहुत ड़रने वाला काम कर रहे हो
देखो तो सही, ये बेफ़िक्री ज़रा एक तरफ़ तो रखो और देखो 
हर रोज़ मरते हुए मेहनतकशों को, थके हुए बच्चों को, भूख से बेहाल लोगों को, उस मासूम को जो थक कर लेटे हुए है ट्रोली बैग पर और उसको खींचती उसकी मां को, सूजे हुए पैरों को, उतरी हुई खालों को, देखो तो सही उनको जो ट्रक की पतली एंग्लो पर खड़े होकर अपने बच्चे को ऊपर पहुंचाने की कशमकश में है, उनको जो टैंक में जान जोख़िम में डाल रहे है 
अगर नहीं देखा तो तुम बेकार हुक्मरान हो और अगर देखकर भी नहीं देख रहे हो तो बहुत बेकार हुक्मरान
क्या ये वो दौर है ये कि कई कई सौ किलोमीटर पैदल सफ़र तय किया जाए, बैल की जगह आदमी जुड़ जाए, साइकिल से हजारों किलोमीटर का सफ़र तय किया जाए
अपनी सियासत कम से कम यहां तो समेट लो, कम से कम यहां तो धन मोह त्याग दो यह तुम्हारे वोटर है इन्होंने ही तो तुमको गद्दी पर बैठाया है इनके लिए इतना तो करना बनता है कि तुम इनको सही सलामत इनके गांवों तक पहुंचा दो 
"ये मेहनतकश ज़ीनत है उन शहरों की जो शहर है ज़ीनत मुल्क की" 
ये मजबूरी में निकल कर आ रहें है उन कमरों से, उन जगहों से जहां ये अपना खून पसीना बहाते है अगर मजबूरी न होती तो अब भी वहीं खून पसीना बहा रहे होते बल्कि बहा रहें है शहरों में न सही शहरों की सड़को पर ही ... 

- आसिफ क़ैफ़ी


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