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मुबल्लिग़ - लघु कथा


मुबल्लिग़

और गुप्ता जी...इस्लाम मे कहा गया है कि मज़दूर को पसीना सूखने से पहले उसे उसकी मज़दूरी दे दो।
डाक्टर फख्रे इस्लाम अभी इस्लाम की खूबियाँ बता ही रहे थे कि बिना दरवाज़ा खटखटाये एक शख़्स उनके चैंबर में आता है। मैला सा कुर्ता पायजामा पहने हुए इस शख्स की दाड़ी के ज़्यादातर बाल सफेद हो चुके थे, जिन्हें मेहंदी लगाकर लाल किया गया था। सर के बालों की भी यही हालत रही होगी लेकिन हरी टोपी की वज्ह से वह साफ़ नज़र नहीं आते थे। डाक्टर साहब उसे पहले से ही जानते थे। उसने कल अस्पताल मे कुछ मरम्मत का काम किया था।उसका इस तरह अंदर आना डाक्टर साहब को अच्छा नहीं लगा।पर इससे पहले वह कुछ कह पाते ,उस शख्स ने सलाम दुआ शुरू कर दी..

“अस्सलाम अलैकुम”
“वा आलेयकुम अस्सलाम”
“कैसे हैं आप ?”
“अल्लाह का करम है”

“डाक्टर साहब कल शाम आप जल्दी चले गये थे, इसलिए हमारी पैमेंट  रह गयी थी”।
 थोड़ा रुक कर कहते हुए उस शख्स ने एक कच्चा बिल डाक्टर साहब की और बढ़ा दिया। डाक्टर साहब ने बिल हाथ मे लिया,चैक किया, अपनी दाड़ी को मुठ्ठी मे भरकर कुछ देर सोचा और फिर अपनी फ़र वाली टोपी मेज़ पर रख कर उस शख़्स से कहने लगे,
“तुमने देर कर दी।आज तो बहुत लोगों की पैमेंट कर दी है, तुम ऐसा करो कल आकर अपना पैसा ले जाना”
यह सुनकर उस हरी टोपी वाले शख़्स का दिल जलकर रह गया ।लेकिन इससे बे नियाज़ डाक्टर फख्रे इस्लाम अपनी टोपी सर पर वापस रखते हुए गुप्ता जी को इस्लाम की एक और ख़ूबी बताने लगे..
“ इस्लाम मे कहा गया है कि जिसने एक बे गुनाह का खुन बहाया ,उसने सारी इंसानियत का खून बहाया…


✒️ नूर उज़ ज़मा नूर
         मुरादाबाद


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